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वनवासी कल्याण आश्रम भारत के वनो मे बसने वाले 10 करोड वनवासियों के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य में संलग्न संस्था है’- मनोज अरोडा

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वनवासी कल्याण परिषद के स्थापना दिवस पर बैठक का हुआ आयोजन
डि-लिस्टींग को लेकर भी हुई चर्चा,20 फरवरी को भोपाल मे होगा वृहद आयोजन

झाबुआ । राकेश पोद्दार। वनवासी कल्याण परिषद झाबुआ द्वारा आज 26 दिसम्बर को स्थानीय वनवासी कल्याण आश्रम में स्थापना दिवसका आयोजन भारत माता एवं वनवासी कल्याण परिषद के संस्थापक पूज्य बालासाहब देशपाण्डे के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। वनवासी कल्याण परिषद के नगर अध्यक्ष मनोज अरोडा ने बडी संख्या में उपस्थितजनो को संबोधित करते हुए कहा कि अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम भारत के वनो मे बसने वाले 10 करोड वनवासियों के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य में संलग्न संस्था है। आश्रम वनवासियों के विकास के लिये सूदूर जनजातीय गांवों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिये तरह-तरह के कार्यक्रम चलाता रहता है। पूरे भारत में इसकी शाखाएँ हैं। इसका मुख्यालय जशपुरनगर छत्तीसगढ़, में है। इसका ध्येयवाक्य है – ’’नगरवासी, ग्रामवासी, वनवासी ’’ है। वनवासी कल्याण परिषद द्वारा देश भर में शिक्षा प्रसार हेतु वनवासी कल्याण आश्रम भी सुदूर जनजाति क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के प्रयास कर रहा है। अनौपचारिक शिक्षा के प्रयास, बालवाड़ी, संस्कार केन्द्र, रात्री पाठशाला, एकल विद्यालय,औपचारिक शिक्षा अन्तर्गत प्राथमिक शाला, माध्यमिक शाला,अभ्यासिका (ट्युशन क्लास), पुस्तकालय, वाचनालय ,स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी वनवासी कल्याण परिषद कार्य कर रही है, किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अत्यंधिक पीड़ा देनेवाली बात यह है की वन पर्वतों में बसे गाँवों में यदि किसी बिमार व्यक्ति को दवाई अथवा उपचार की आवश्यकता है और वह उसके गाँव में यदि उपलब्ध नहीं है तो उसकी क्या स्थिति होगी ? तब उसे कई किलो मीटर दूर जाना मबुरी हैै। आरोग्य सेवा सभी को उपलब्ध हो इस हेतु वनवासी कल्याण आश्रम जनजाति क्षेत्र में सेवा प्रल्प को साकार कर रहा है। प्रदेश एवं देश में कहीं चिकित्सा केन्द्र तो कहीं छोटासा अस्पताल, कहीं चल चिकित्सालय (मोबाईल मेडिकल युनिट) तो कहीं आरोग्य रक्षक योजना जैसे विविध प्रयास भी परिषद कर रही हैै। लाखों रोगियों को वर्ष भर में दवाईयाँ अथवा उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जारही है । इस हेतु नगरों से कई सेवाभावी चिकित्सक अपना मूल्यवान समय देकर सेवारत है। देश के कुछ राज्यों में पशुओं की चिकित्सा हेतु भी कम चल रहा है। वर्षाकाल जैसे समय आवागमन की प्रतिकूलता का विचार किये बगैर छोटे-छोटे गाँवों में चिकित्सा शिविरों का आयोजन होता है। ऐसे वर्ष भर में हज़ारों चिकित्सा शिविरों में लाखों वनवासी बन्धु लाभान्वित होते है। वही संस्कार,संस्कृति रक्षा वनवासी खेलो का आयोजन भी किया जाता है। वनवासी बन्धुओं में शारीरिक क्षमता एवं कौशल विपूल मात्रा में है। सुदूर गाँवों में जाना खेल प्रतिभाओं की शोध कर उन्हें प्रशिक्षण देकर अवसर प्रदान करना यह खेलकूद आयाम का महत्वपूर्ण कार्य है। आज कई वर्षों से इस खेलकूद के क्षेत्र में कार्यरत वनवासी कल्याण आश्रम ने अनेक उपलब्धियाँ पाई। प्रतिवर्ष वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा तीरंदाजी और किसी एक खेल की प्रतियोगिता भी आयोजित होती है।
इस अवसर पर स्वागत भाषण देते हूए जिलाध्यक्ष मुन्नालाल निनामा ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस मना रहे है । जन सेवा जनार्दन सेवा की भावना से वनवासी कल्याण परिषद द्वारा वनवासी अंचलों में पूरी निष्ठा एवं निर्विकार भाव से कार्य कर रहा हैंै।उन्होने बताया कि प्रारंभ के दिनों में नागपुर (महाराष्ट्र) से डा. एस.टी.सिलेदार एवं उनकी धर्म पत्नी डॉक्टर शिल्पा सिलेदार दोनों ने वनवासी वन्धुओं का सेवा व्रत लेकर कठिन परिस्थितियों में कार्य किया वे लोहरदगा के लिए चिकित्सा कार्य के लिए वरदान साबित हुए ।
वनवासी कल्याण परिषद के जिला संगठक मानसिंह भूरिया ने ने वनवासी कल्याण परिषद के स्थापना दिवस के अवसर पर अपने उदगार व्यक्त करते हुए कहा कि वनवासी कल्याण परिषद वर्ष 1952 से पूरे देश में रहने वाले 12 करोड़ वनवासी बंधुओं के सर्वांगीण विकास के लिए सेवारत है व पूरे देश में शिक्षा चिकित्सा, कृषि विकास, आर्थिक विकास, श्रद्धा जागरण व खेल कूद जैसे 21 हजार सेवा प्रकल्पों द्वारा दो करोड़ वनवासी बंधुओं को लाभान्वित कर रहा है। उन्होंने बताया कि सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले वनवासी बंधु राष्ट्र के प्रहरी के रूप में काम करते हैं। बच्चों को शिक्षा, आवास, भोजन व अन्य सभी सुविधाएं निशुल्क समाज के सहयोग से दी जा रही है। छात्र जितना पढ़ सकता है संस्था उसकी व्यवस्था करती है। वनवासी कल्याण परिषद का ध्येय ही वनवासी अंचल मे बसे वनवासी एवं दरिद्रनारायणों को सनातन संस्कृति के साथ ही सेवा भावना के माध्यम से उनके शैक्षणिक एवं बोद्धिक स्तर को उपर उठाना हे। झाबुआ अंचल के वनवासियों के बीच बेहतर तरिके से कार्य कर रहा हे । झाबुआ में वनवासी आश्रम के माध्यम से बच्चों के नैतिक, बौद्धिक, शारीरिक विकास की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है।
इस अवसर पर श्री श्यामा ताहेड ने अपने उदबोधन में डि-लिस्टींग का जिक्र करते हुए अंचल में धर्मान्तरण पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिलिस्टिंग याने मतांतरित हो चुके आदिवासियों को आरक्षण की सूची से बाहर किए जाने की मांग लगातार उठती रही है। श्री ताहेड ने आगे कहा कि मौजूदा क़ानूनों के तहत भी जबरन धर्मांतरण कराना एक अपराध है। ये बात सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 22 अप्रैल 1947 को संविधान सभा में मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों से जुड़ी सलाहकार समिति के चेयरमैन की हैसियत से कही थी। संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी। इसे अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों के तौर पर देखा गया और दो दशक तक चीज़ें सामान्य रहीं। किन्तु धीरे धीरे धर्मान्तरण कर भोलेभाले आदिवासी वनवासी भाईयों को ईसाई धर्म में लालच आदि देकर धर्मान्तरित किया गया हेै । महामहीम राष्ट्रपतिजी से भी ऐसे धर्मान्तरित हुए आदिवासियों को धर्म त्यागने के कारण जनजाती के नाम से मिल रही सभी सुविधायें, आरक्षण आदि का लाभ नही मिलने के बारे मे ज्ञापन सौपे गये हैे । इसे लेकर कई बार आन्दोलन भी हुए है । मौजूदा केन्द्र एवं राज्य सरकार से भी मांग की जारही है कि ऐसे धर्मान्तरित आदिवासी जो सनातन संस्कृति त्याग कर अन्य धर्म को मान रहे है उन्हे शासकीय सेवाओं में आरक्षण, नौकरी आदि से हटाया जाना चाहिये । इसे लेकर आगे भी हम सभी कृत संकल्पित है।
बैठक में यह भी जानकारी दीगई कि आगामी 20 फरवरी 2023 को राजधानी भोपाल में वनवासी कल्याण परिषद एवं डि-लिस्टींग को लेकर विशाल सम्मेलन एवं रैली का आयोजन किया जारहा है जिसमें पूरे प्रदेश से लाखों की संख्या में वनवासी ऐत्रित होकर अपनी पूरजोर मांग उठायेगें । इस बैठक में मुन्नालाल नीनामा, गणपतसिंह मुनिया जिला संगठन मंत्री, कानजी भूरिया महामंत्री, मानसिंह भूरिया संचालक, अल्केश मेडा, श्यामा ताहेड, नगर उपाध्यक्ष जयेन्द्र बैरागी, अनील पोरवाल,चेनसिंह जमरा, महेश मुजाल्दा, वालसिंह मसानिया, मोनू भूरिया, बब्बु त्रिवेदी सहित बडी संख्या में कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी उपस्थित थे कार्यक्रम का संचालन गणपत मुनिया ने किया तथा आभार कानजी भूरिया ने किया ।