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MNS के अध्यक्ष राज ठाकरे ने उद्धव को पत्र लिखकर पूछा- क्या हिंदू भावनाओं के प्रति बहरी हो चुकी है सरकार ?

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मुंबई: महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज उद्धव ठाकरे सरकार कोविड 19 सहित कई चुनौतियों से जूझ रही है। राज्य सरकार के धार्मिक स्थलों को नहीं खोलने को लेकर राज्य में राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दल बीजेपी लगातार इस मामले को लेकर जहां उद्धव सरकार को घेर रही है वहीं अब इसमें मनसे प्रमुख राज ठाकरे भी शामिल हो गए हैं। राज ठाकरे ने उद्धव को पत्र लिखते हुए इस मुद्दे पर अपनी निराशा जाहिर की है और लिखा है कि क्या सरकार हिंदू भावनाओं के प्रति बहरी हो चुकी है?

 

सोई है सरकार?

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने गुरुवार को अपने चचेरे भाई और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखते हुए कहा, ‘मुझे आश्चर्य है कि महा विकास अघाड़ी सरकार सोई हुई है और हिंदुओं की भावनाओं के प्रति बहरी हो चुकी है। हम सरकार से मंदिर खोलने की मांग करते हैं और यदि सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो लोग सब प्रतिबंधों(लॉकडाउन) को भूलकर भगवान के दर्शन के लिए मंदिरों की तरफ मार्च करेंगे।

 

मनसे का यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है जब आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल-ए-मुस्लिमीन के सांसद इम्तियाज जलील और वंजीत बहुजन अगाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने राज्य में सभी पूजा स्थलों को फिर से खोलने के लिए स्वतंत्र आंदोलन शुरू किया है।

 

क्यों रखा जा रहा है भगवान को भक्तों से दूर- राज

राज ने सवाल उठाते हुए कहा कि अनलॉक 1, 2, 3, के दौरान कई मानदंडों में ढील दी गई है, मॉल फिर से खोल दिए गए हैं और प्रोटोकॉल के साथ 100 लोगों तक की सार्वजनिक सभाओं की अनुमति है। ऐसे में भगवान को लोगों से दूर क्यों रखा जा रहा है। उन्होंने मांग करते हुए कहा कि ‘इसके बीच, भगवान को उनके भक्तों से अभी भी दूर रखा जा रहा है। मंदिरों को खोलने का इतना विरोध क्यों है?’ राज ने ने सुझाव देते हुए कि मंदिरों को फिर से शुरू करने के लिए प्रोटोकॉल तैयार किए जा सकते हैं।

 

राज ने दिए उदाहरण

उन्होंने कहा कि राज्य के लोगों ने कोरोनोवायरस महामारी को देखते हुए सभी धार्मिक स्थलों को बंद रखने के सरकार के फैसले का पूरे दिल से समर्थन किया और आषाढ़ी वारि, जन्माष्टमी और गणेशोत्सव जैसे सभी प्रमुख त्योहारों के लिए, हिंदुओं ने सभी नियमों का पालन करते हुए जबरदस्त परिपक्वता का परिचय दिया है।  राज ने तर्क दिया कि मंदिरों को फिर से खोलना सिर्फ भक्तों के आने और जाने का सवाल नहीं है, बल्कि ‘पुजारियों’ के साथ एक चेन इसमें शामिल है,  जिसमें ‘पूजा’ सामाग्री को बेचने वाली दुकानें और मंदिर से जुड़ा व्यवसाय़ शामिल है। लेकिन लगता है कि सरकार को उनकी आजीविका की कोई चिंता नहीं है।

 

 

 

 

 

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