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मनुष्य सहज रूप से निर्मल और पवित्र होता हैं, परन्तु बुरी संगत में पड़कर वह बुरी आदतें अपना लेता हैं- नगीनलाल पंवार

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साई सप्ताह में समिति द्वारा की गई गौ-सेवा

झाबुआ ।राकेश पोद्दार। नगर संवाददाता। व्यक्ति समष्टि का अंग हैं, समष्टि सृष्टि का एक हिस्सा हैं, जो परमेष्टी में से उत्पन्न हुई हैं। इस कारण से सृष्टि में बने समाज की बिना किसी स्वार्थ के पवित्र सेवा करना प्रत्येंक का कत्र्तव्य बनता हैं। ऐसे व्यक्तियों से मिलकर ही सच्चा समाज बनता हैं। व्यंक्ति का प्रत्येक कार्य समाज सेवा के प्रयोजन से ही होना चाहिए सभी इसी समाज के सदस्य हैं। हालांकि व्यक्ति व्यक्ति से भिन्न हैं, परन्तु सबके अंदर एक समान ही ह्ृदय है। अर्थात सत्य एक है। परन्तु विद्वान उसे अलग-अलग नाम से पुकारते हैं। एकात्मा सर्व भूतान्तर आत्मा- अर्थात एक ही आत्मा सभी जीवों में वास करती है। उक्त बात श्री सत्यसाई सप्ताह के अन्तर्गत उपस्थित साई भक्तों को संबोधित करते हुए समिति के वरिष्ठ सदस्य नगीनलाल पंवार ने व्यक्त किये ।
उन्होने कहा कि श्री सत्यसाई बाबा ने कहा था कि मानव जीवन यह कोरा कागज है, इसमें यदि सब्जियाँ बांधोगे तो उसमें उनकी गंध फैल जायेगी,। कागज की अपनी गंध नहीं होती हैं, जिस वस्तु को उसमें रखा जाए उसकी गंध तो वह अपने मे समा लेता हैं, मनुष्य भी सहज रूप से निर्मल और पवित्र होता हैं, परन्तु बुरी संगत में पड़कर वह बुरी आदतें अपना लेता हैं। उन्होने कहा कि बाबा ने कहा था कि कैसे लोगो की संगत में तुम रहते हो, तुम किस प्रकार के इंसान हो , तो तुम किस प्रकार के इन्सान हो यह मै बता सकता हूँ । इसलिए अपने सभी प्रकार के कामों मे अच्छांे लोगों की संगत में ही रहना परम आवश्यक हैं। तुम्हारा साथ ही अच्छा् या बुरा बनाता हैं। इसलिए बुरे लोगो की संगत से बच कर रहों। जिनकें ह्ृदय निर्मल हों और भावनाएं पवित्र हों ऐसे लोगो का साथ बनाओं । हर मनुष्य समाज का अंग है और आज जो बुराईयाँ समाज में फैली हुई हैं, वे एक-एक व्यक्ति की निजी बुराईयों के परिणाम स्वरूप हैं। उसी प्रकार से समाज की बुराईयों का प्रभाव व्यक्ति पर पड़ता हैं। सम्पूर्ण सृष्टि दिव्य हैं । सभी प्राकृतिक रूप से पावन हैं । परन्तु वातावरण से प्रभावित होकर आचरण बदल सकता हैं ।
श्री पंवार ने कहा कि अलग-अलग नामों से भगवान में कोई भेद मत करो । ऐसे ही नाम और रूप अलग-अलग होने पर भी आत्मा सबमें समान हैं। राम या कृष्ण इन नामों के साथ नहीं जन्में थें। उनके माता -पिता ने उनको ये नाम दिये थे । भगवान किसी नाम के साथ जन्म नहीं लेते हैं। वे निर्गुण, निरजंन, सनातन, निकेतन , नित्य , शुद्ध, बुद्ध मुक्त और निर्मल स्वरूप वाले हैं। भगवान तो प्रेम स्वरूप, सत्य -स्वरूप हैं सत्य ईश्वर है। प्रेम ईश्वर है। प्रेम में जियो। अपने ह्ृदय को प्रेम से भर लो, तथा प्रेम पूर्ण जीवन बिताओं। सबसे प्रेम करों, क्योंकि भगवान सभी में प्रेम रूप मे मौजूद हैं। इस संसार मे प्रेम रहित कोई भी नहीं हैं प्रेम के कई रूपों मे ऐसा लग सकता है। परन्तु वास्तव में प्रेम एक है।
श्री सत्यसाई सेवा समिति द्वारा मनाये जारहे साई सप्ताह में समिति के सेवा कार्यो के तहत स्थानीय श्री गोवर्ध्रननाथजती भगवान की हवेली में स्थित गौशाला में गायों को हरी सब्जियां खिलाई गई । समिति की बाल विकास कन्वीनर श्रीमती ज्योति सोनी के अनुसार 23 नवम्बर को श्री सत्यसाई बाबा के जन्म दिन सेवा दिवस के रूप में धुमधाम से मनाया जावेगा । इस दिन दिन भर सेवा गतिविधियों के साथ सायंकाल 6 से 7 तक सर्वधर्म नाम संर्कीन एवं महा प्रसादी का आयोजन किया गया हेै ।