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परोपकार से ही ईष्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है- डा.के.के.त्रिवेदी श्री सत्यसाई सेवा समिति द्वारा श्रद्धापूर्वक मनाया गया बाबा का 96 वां जन्मोत्सव वनवासी आश्रम के बच्चों के बीच की गई नारायण सेवा

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झाबुआ । राकेश पोद्दार। नगर संवाददाता। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। ये बातें श्री सत्यसांई सेवा समिति द्वारा आयोजित भगवान श्री सत्यसाई बाबा के 96 वें जन्म दिन पर मुख्य वक्ता डा. केके त्रिवेदी ने व्यक्त करते हुए कहा कि मात्र धर्म ही होता है जिसके सहारे मानव आगे बढ़ता है और उसकी आस्था समाजसेवा में धर्म के कारण ही आगे बढ़ती है। उन्होने कहा कि सबसे बड़ा धर्म तो मानव की सेवा करना ही होता है जो कि निःस्वार्थ भाव से की जानी चाहिए। उन्होने आगे कहा कि यदि कोई सेवा करनी है तो वह निःस्वार्थ भाव से की जानी चाहिए। यदि देखा जाए तो आज के युग में माता-पिता की सेवा से बढ़कर अन्य कोई वास्तविक सेवा नहीं है। इसीलिए कहा गया है कि मानव सेवा ही माधव सेवा है। कहते हैं माता-पिता की सेवा सीधी भगवान तक पहुंचती है, इसलिए हमें कभी-भी अपने माता-पिता के उपकारों को नहीं भूलना चाहिए। यह धु्रव सत्य है कि आज के इस युग में माता-पिता से बढ़कर अन्य कोई सेवा नहीं है।
श्री त्रिवेदी ने मानव सेवा के बारे मे आगे कहा कि अगर अपने से दीन-हीन, असहाय, अभावग्रस्त, आश्रित, वृद्ध, विकलांग, जरूरतमंद व्यक्ति पर दया दिखाते हुए उसकी सेवा और सहायता न की जाए, तो समाज भला कैसे उन्नति करेगा ? सच तो यह है कि सेवा ही असल में मानव जीवन का सौंदर्य और श्रृंगार है। सेवा न केवल मानव जीवन की शोभा है, अपितु यह भगवान की सच्ची पूजा भी है। भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, विद्यारहितों को विद्या देना ही सच्ची मानवता है। उन्होने कहा कि परोपकार एक ऐसी भावना है, जिससे दूसरों का तो भला होता है, खुद को भी आत्म-संतोष मिलता है। मानव प्रकृति भी यही है कि जब वह इस प्रकार की किसी उचित व उत्तम दिशा में आगे बढ़ता है और इससे उसे जो उपलब्धि प्राप्त होती है, उससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।

उन्होने अपने सारगर्भित उदबोधन में कहा कि इसी तरह अगर किसी को अकारण दुख दिया जाता है और उसे पीड़ा पहुंचाई जाती है, तो इसके समान कोई पाप नहीं है। ऋषि-मुनियों ने बार-बार कहा है कि धरती पर जन्म लेना उसी का सार्थक है, जो प्रकृति की भांति दूसरों की भलाई करने में प्रसन्नता का अनुभव करे। एक श्रेष्ठ मानव के लिए सिर्फ परोपकार करना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ देश और समाज की भलाई करना भी उसका धर्म है। बेशक, आज के युग में भी कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपने सुखों को छोड़कर दूसरों की भलाई करने में और दूसरों का जीवन बचाने में अपना जीवन होम कर रहे हैं,। जिस शरीर से धर्म नहीं हुआ, यज्ञ न हुआ और परोपकार न हो सका, उस शरीर का क्या लाभ ? सेवा या परोपकार की भावना चाहे देश के प्रति हो या किसी व्यक्ति के प्रति, वह मानवता है। इसलिए हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि परोपकार से ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होने कहा कि हमे धर्म को माध्यम बनाना चाहिये। प्रसाद की जगह भूखों को भोजन कराना ही चाहिये । श्री त्रिवेदी ने कहा कि सामान्य भोजन से पुष्टि- शक्ति मिलती है और प्रसाद से चेतन्य प्राप्त होता है, अतः हमें भोजन भी प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए । घर मे भी किये जाने वाले भोजन को भी प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिये तथा झुठन आदि नही छोडना चाहिये । उन्होने कहा कि दी जाने वाली दक्षिणा भगवान ग्रहण नही करते किन्तु इस एकत्रित राशि से कई कल्याणकारी प्रकल्प चलते है। श्री त्रिवेदी के अनुसार। गरीबों को अनदेखा नही करते हुए उसे आंसू पोछना ही सच्ची माधव सेवा कही जाती है । उन्होने सम्राट अशोक महान एवं देवी अहिल्याबाई होल्कर का उदाहरण देते हुए हुए उनके द्वारा किये गये समाजसेवा के कार्यो की विस्तार से जानकारी दी । वाल्मिकी के उदाहरण के माध्यम से उन्होने बताया किस तरह क्रु्रर व्यक्ति भी एक अनुकरणीय एवं पूजनीय हस्ती बन जाता हैै। विवेकानंद भी दरिद्रनारायण सेवा भी समर्पित भाव से किये जाने के बारे में विस्तार से बताया । उन्होने कहा कि भारत की पूरातन संस्कृति ’’ सर्वे भवन्तु सूखिना, सर्वे सन्तु निरायम ’’ के महामंत्र को साकार करती है। हमे मानव सेवा को माधव सेवा के रूप में अंगीकार करना चाहिये ।

इस अवसर पर समाजसेवी यशंवत भंडारी ने भी श्री सत्यसाई बाबा को अवतारी व्यक्तित्व बताते हुए भारत को देवभूमि बताया । हर अवतार ने समाज को हर बार नवीन सन्देश दिये है जो मानव कल्याण के प्रकल्प बने है । उन्होने मोहम्मद साहब, महावीर, बुद्ध, नानक ईसा मसिह का जिक्र करते हुए समाज में सकारात्मक का्रंतिकारी परिवर्तन की व्याख्या भी की । श्री सत्यसाई बाबा ने जो सेवा कार्य प्रारंभ किये, हास्पीटल, स्कूल, गरीबों के हितार्थ सेवा कार्य के साथ आध्यात्मिकता का जो सन्देश दिया वह हृदयांगम करना आज की आवश्यकता है । बाबा सेवा, करूणा, परोपकार, धर्म के अवतार थे उनके बताये माग्र पर चल कर हम सभी को सेवा सेवा को समर्पित भाव से करना चाहिये । उन्होने गुरू महिमा का जिक्र कररते हुए स्वरचित कविता ऐ मेरे भगवंत क्या तुम्हे अर्पित करू प्रस्तुत कर सत्यसाई बाबा के आदर्शो का सभी को संकल्प लेने की आवश्यकता बताई ।
समिति के सौभाग्यसिंह चैहान ने स्वागत भाषण देते हुए कहा और वे दिन स्मरण किए कि किस प्रकार से सत्य सांई बाबा स्वयं हमारा मार्गदर्शन किया करते थे। यह सत्य है कि शारीरिक रूप से सत्य सांई बाबा हमारे बीच में नहीं हैं परन्तु समाधि लेने के पश्चात वे हमारे दिलों में और अधिक नजदीक हो गए हैं।

समिति के कन्विनर कमलेश सोनी ने जानकारी देते हुए बताया कि भगवान श्री सत्यसाई बाबा के 96 वें जन्म दिवस के अवसर पर सिद्धेश्वर कालोनी मे सत्यसाई सप्ताह में 17 से 23 नवम्बर तक आध्यात्मिक एवं सेवा कार्य किये गये । बाबा के जन्मोत्सव के अवसर पर प्रातः 9 बजे से लक्ष्यार्चना का अभिनव कार्यक्रम आयोजित किया गया । इसके बाद वनवासी आश्रम में अध्ययन कर रहे बच्चों के बीच जाकर उनके मध्य नारायण सेवा के तहत स्वादिष्ट नाश्ता करवाया गया तथा भोजन करवाया । दिन भर समिति के सदस्य राजेन्द्रकुमार सोनी, नगीनलाल पंवार, सौभाग्यसिंह चैहान, गजानन यावले, विनोद यावले, श्रीमती रेखा सोनी, श्रीमती ज्योति सोनी, श्रीमती कृष्णा चैहान, श्रीमती आज्ञा छाबडा, किरण सोनी, ललीता सोनी, सुषमा सरोळकर, विलास सारोलकर, श्रीमती आर्य आदि ने सेवा गतिविधियों में सहभागिता की ।
इस अवसर पर बाबा की आकर्षक झांकी सजाई गई तथा पुष्प से रांगोली उकेरी गई। सायंकाल 6 बजे से समिति के सदस्यों द्वारा सर्वधर्म भजनों की संगीतमय प्रस्तुति दी गई । इस अवसर पर सहायक आयुक्त आदिवासी विकास झाबुआ प्रशान्त आर्य ने श्री सत्यसाई बााबा की महामंगल आरती की । आरती के पश्चात लड्डूंओ की प्रसादी का वितरण किया गया । साई बाबा के जन्मोत्सव के अवसर पर डा. के.के.त्रिवेदी, समाज सेवी यशवंत भंडारी, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष ओमप्रकाश शर्मा सहित नगर के गणमान्य जनों एवं महिलाओं ने उपस्थित रह कर कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान दिया । आरती प्रसादी वितरण के बाद सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के लिये भोजन प्रसादी का आयोजन किया गया । समिति कन्विनर कमलेश सोनी ने सभी आगन्तुकों का आभार व्यक्त किया ।