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भोपाल गैस त्रासदीः केंद्र की याचिका से SC खफा, कहा वह ‘शूरवीर’ नहीं; पढ़ें 10 बड़े अपडेट | Bhopal gas tragedy Supreme Court tell centre Cannot decide curative plea for additional funds as lawsuit maryada jurisdiction

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भोपाल गैस त्रासदीः केंद्र की याचिका से SC खफा, कहा- वह

1984 के भोपाल गैस त्रासदी पर जस्टिस संजय किशन कौल की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ मामले की सुनवाई कर रही है. पिछले 2 दिन से जारी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ‘मर्यादा’ का जिक्र करते हुए केंद्र से कहा कि कुछ छूट होने के बावजूद हम कानून के दायरे में विवश हैं.

भोपाल गैस त्रासदी

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र से कहा कि वह शूरवीर की तरह काम नहीं कर सकता और 1984 के भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को मुआवजा के लिए यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) की उत्तराधिकारी कंपनियों से 7,844 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग वाली उपचारात्मक याचिका पर फैसला नहीं कर सकता. इससे पहले कोर्ट ने उपचारात्मक याचिका दाखिल करने पर मंगलवार को केंद्र से नाखुशी जताई थी. पिछले 2 दिन से कोर्ट में मामले की हो रही सुनवाई आज गुरुवार को भी जारी रहेगी.

जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ मामले की सुनवाई कर रही है. इस संविधान पीठ में न्यायमूर्ति कौल के अलावा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति अभय एस ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी शामिल हैं. दो दिन से चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां कीं.

गैस त्रासदी पर जारी सुनवाई से जुड़ी 10 अहम बातें

  1. शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान केंद्र से कहा कि वह पहले ही अपने उपचारात्मक क्षेत्राधिकार की ‘मर्यादा’ (शुचिता) के बारे में कह चुकी है और कुछ छूट होने के बावजूद कानून के दायरे में विवश है.
  2. जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से कहा, “किसी और की जेब ढीली कराना और पैसा निकालना बहुत आसान होता है. अपनी खुद की जेब ढीली करें और पैसे दें तथा फिर विचार करें कि क्या आप उनकी (यूसीसी की) जेब ढीली करवा सकते हैं या नहीं.”
  3. उपचारात्मक याचिका दाखिल करने को लेकर केंद्र से सवाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘मैंने अधिकार क्षेत्र की ‘मर्यादा’ कहकर सुनवाई की शुरुआत की. देखिए, हम शूरवीर नहीं बन सकते. यह संभव नहीं है. हम विवश हैं.
  4. कोर्ट ने कहा, “कानून के दायरे में, हालांकि हमारे पास कुछ छूट हैं, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि हम एक मूल मुकदमे के क्षेत्राधिकार के आधार पर एक उपचारात्मक याचिका का फैसला करेंगे.”
  5. कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र से कहा था कि वह न्याय-अधिकार क्षेत्र की मर्यादा से बंधा है और सरकार कंपनी के साथ हुए समझौते को 30 साल से अधिक समय बाद दोबारा नहीं खोल सकती.
  6. शीर्ष अदालत ने कहा कि लोगों को पसंद आना न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकता है. वैश्वीकृत दुनिया में यह अच्छा नहीं लगता कि भले ही आपने भारत सरकार के साथ कुछ तय किया हो, इसे बाद में फिर से खोला जा सकता है.
  7. पीठ ने कल से लेकर आज तक वेंकटरमणी के माध्यम से केंद्र की दलीलें कम से कम सात घंटे तक सुनी. संविधान पीठ ने कहा, “जहां तक ​​देयता और मुआवजे का संबंध है, पक्षों के लिए यह हमेशा खुला होता है कि वह कहे कि मैं समझौता करना चाहता हूं और किसी भी तरह के मुकदमेबाजी से छुटकारा पाना चाहता हूं.”
  8. “अब, आप (केंद्र) समझौते को संशोधित करना चाहते हैं. क्या आप इसे एकतरफा कर सकते हैं? यह एक डिक्री नहीं बल्कि एक समझौता है.”
  9. केंद्र 1989 में हुए समझौते के हिस्से के रूप में अमेरिकी कंपनी से प्राप्त 47 करोड़ अमेरिकी डॉलर (715 करोड़ रुपये) के अलावा अमेरिकी कंपनी यूसीसी की उत्तराधिकारी कंपनियों से 7,844 करोड़ रुपये चाहता है.
  10. केंद्र इस बात पर जोर देता रहा है कि 1989 में बंदोबस्त के समय मानव जीवन और पर्यावरण को हुई वास्तविक क्षति की विशालता का ठीक से आकलन नहीं किया जा सका था. सुनवाई बेनतीजा रही और आज गुरुवार को भी जारी रहेगी.

इनपुट – एजेंसी/ भाषा