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virtual ram benefits: वर्चुअल रैम का बोलबाला! आखिर क्यों स्मार्टफोन के लिए है जरूरी और कैसे करती है काम, एक क्लिक में जानें हर डिटेल – know what is virtual ram and why it is important for smartphones here is everything you need to know

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हाइलाइट्स

  • सुर्खियां बटोर रही है वर्चुअल रैम
  • स्मार्टफोन्स के लिए हो गई है जरूरी
  • यहां मिलेगा हर सवाल का जवाब

नई दिल्ली। एक शब्द है- वर्चुअल रैम, जो आजकल खूब सुर्खियां बटोरे हुए है। लेकिन क्या आपको इसके बारे में कुछ भी मालूम है। आखिर क्यों इसे स्मार्टफोन्स के लिए जरूरी बताया जा रहा है। क्या है इसके फायदे और नुकसान? वर्चुअल रैम से जुड़े हर एक सवाल का जवाब आपको आज हम देने जा रहे हैं, ताकि आपके मन में किसी भी तरह का कंफ्यूजन न रह जाए। अभी तब फ्लैगशिप फोन के साथ आने वाला ये वर्चुअल रैम फीचर अब आपको बजट फोन्स में भी मिलने लगा है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में कई सारे स्मार्टफोन्स इस फीचर के साथ इंट्रोड्यूज हो सकते हैं। तो चलिए जानते हैं कि वर्चुअल रैम कितनी फायदेमंद होती है और इसकी फोन के परफार्मेंस पर कितना असर रहता है।

आमतौर पर लोग रैम का मतलब समझते हैं- रैंडम एक्सेस मेमोरी। लेकिन वर्चुअल रैम या एक्सटेंडेड रैम जैसे शब्द लोगों के लिए नए हैं। वर्चुअल रैम के पूरे कांसेप्ट को समझने के लिए ये जरूरी हो जाता है कि आप पहले ये समझे कि रैम क्या है? बात स्मार्टफोन के रैम की करें, तो ये एक वोलाटाइल मेमोरी है, जो किसी भी प्रकार के अन्य स्टोरेज के तुलनात्मक तौर से तेज होती है।

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जब भी आप अपने फोन में किसी एप्लीकेशन को ओपन करते हैं, तो इसे एक प्रोसेस कहा जाता है। बैकग्राउंड में इस प्रोसेस को फिजिकल रैम पर स्टोर किया जाता है। यही वो वजह है कि जब आप ऐप को ओपन करते हैं, तो ये बिना देर किए ओपन हो जाते हैं। आसान शब्दों में समझा जाए तो वर्चुअल रैम एक ऐसी सुविधा है, जहां आपके फोन के इंटरनल स्टोरेज के किसी हिस्से को वर्चुअल रैम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे काम करती है वर्चुअल रैम ?

जैसा की आप नाम से ही समझ रहे होंगे कि ये एक वर्चुअल रैम है, जिसका मतलब हुआ कि ये आपको फोन में फिजिकल रूप से नजर नहीं आएगी। ये आपके फोन का इंटरनेल हिस्सा है, जो टेंपररी फाइल स्टोर करने के लिए आपके फोन के इंटरनल स्टोरेज के एक हिस्से को रिजर्व रखता है। जब कभी-भी अधिक रैम की आवश्यकता पड़ती है, तो इसका उपयोग किया जाता है।

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बता दें कि चाहें स्मार्टफोन हो या फिर कंप्यूजर या पीसी… रैम जितनी कम होती, उतनी ही डिवाइस की परफार्मेंस स्लो यानी की धीमी होगी।

जब भी आप स्मार्टफोन पर एक से ज्यादा एप्स ओपन करते हैं, तो ऐसे वक्त में रैम के बड़ा रोल रहता है। क्योंकि इस समय आप रैम का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर रहे होते हैं। इस स्थिति में वर्चुअल रैम महत्वपूर्ण रोल अदा करती है। वर्चुअल रैम अस्थायी फाइलों को रिजर्व इंटरनल स्टोरेज में भेज देने का काम करती है। ऐसा होने से फिजिकल रैम में अधिक एप्लीकेशन लोड करने के लिए ज्यादा स्पेस मिल जाता है।

रैम आप्टिमाइजेशन क्या होता है?

सभी स्मार्टफोन्स में वर्चुअल रैम की सुविधा नहीं होती है। ऐसे में जिन फोन्स में ये सुविधा नहीं होती है, उसमें एक साथ कई ऐप्स ओपन करने से जब उपलब्ध रैम खत्म हो जाती है तो ऐप्स से संबंधित टेंपररी फाइल को एंड्राइड आप्टिमाइजेशन बैकग्राउंड में डिलीट करना शुरू कर देता है। इसी प्रक्रिया को रैम आप्टिमाइजेशन कहते हैं। इसकी मदद से आप नए ऐप्स को इस्तेमाल आसानी से कर पाएंगे। लेकिन इसका एक ड्रॉबैक भी है, क्योंकि जब आप पुराने ऐप्स को दोबारा विजिट करते हैं, तो वो फिर से री-स्टार्ट हो जाते हैं। यानी की यहां पर आपने ऐप्स को ओपन छोड़ा है, वो वहां से न खुलकर, फिर से ओपन होगा।

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फिजिकल रैम Vs वर्चुअल रैम?

अब समझते हैं कि क्या वर्चुअल रैम भी फिजिकल रैम की तरह अच्छी होती है। यानी की फायदेमंद होती है। अगर दोनों की तुलना करें तो परफार्मेंस के हिसाब से फिजिकल रैम हमेशा वर्चुअल रैम से तेज होती है। इसके पीछे की वजह भी समझ लेते हैं। दरअसल, इंटरनल स्टोरेज की तुलना में रैम की स्पीड हमेशा तेज होती है, जब हम एक्सपेंडेबल वर्चुअल रैम का यूज करते हैं, तो बहुत सारा डाटा रैम से इंटरनल स्टोरेज पर ट्रांसफर हो जाता है। इसके बाद वो फिर से वापस रैम में आ जाता है। रैम के केस में कुछ भी मैनुअली करने की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि जब भी अधिक रैम की जरूरत पड़ती है, तो स्मार्टफोन खुद ही ये काम कर लेता है।

स्मार्टफोन्स में क्यों दिया जा रहा है ये फीचर?

वैसे देखा जाए तो ये तकनीक कोई नई नहीं है। पहले से ही पीसी यूजर्स ये तकनीक यूज करते हैं। लेकिन आजकल लोगों के अधिकतर काम स्मार्टफोन्स से ही हो रहे हैं, इसलिए उनको स्मार्टफोन्स में भी अधिक रैम की जरूरत पड़ रही है। कुछ वक्त पहले तक तो 4 जीबी रैम में भी लोगों का काम चल जाता था, लेकिन समय के साथ स्मार्टफोन पर लोगों की निर्भरता बढ़ी हैं, ऐसे में स्मार्टफोन की रैम को लेकर भी भी कंपनियों काम कर रही है। दरअसल, हार्डवेयर के जरिए अधिक रैम को ऐड करना न सिर्फ कठिन बल्कि महंगा भी पड़ता है, इसलिए बिना अतिरिक्त लागत के कंपनियां वर्चुअल रैम की सुविधा कस्टमर्स को देने लगी हैं।

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वर्चुअल रैम की खासियत:

1- वर्चुअल रैम होने से फोन और भी खास हो जाता है, क्योंकि कस्टमर्स को कम प्राइस प्वाइंट में ज्यादा रैम की सुविधा मिलती है।
2- फिजिकल रैम पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता है और फोन अच्छी बेहतर परफार्मेंस भी देता है।
3- कोई भी 6 जीबी+2 जीबी वर्चुअल रैम वाला फोन 8 जीबी रैम वाले फोन के बराबर परफार्मेंस तो नहीं देगा, लेकिन ये जरूर है कि ये उससे सस्ता हो सकता है।
4- बेहतर रैम मैनेजमेंट पेश करता है।
5- गेमर्स और हैवी मल्टी टास्किंग वालों के लिए ये फीचर काफी फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि इन कामों के लिए ज्यादा रैम की जरूरत पड़ती है।

वर्चुअल रैम की खामियां:

1- ये फीचर तब भी काम आता है, जब अतिरिक्त स्टोरेज की जरूरत पड़ती है। ये खाली इंटरनल स्टोरेज का यूज टेंपररी रैम के तौर पर करती है।
2- अगर पहले से ही आपका फोन कुल इंटरनल स्टोरेज की क्षमता के करीब है। साथ ही, वर्चुअल रैम का स्पेस भी फुल हो चुका है, ऐसी स्थिति में फोन सिर्फ डेडिकेटेड रैम का ही इस्तेमाल करेगा, जो पहले से मौजूद है।