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अभिव्यक्ति : फिर विवादों में घिरा सुप्रीम कोर्ट का फैसलाः महामारी से निपटने के लिए बनाये गये टास्क फोर्स में प्रतिनिधत्व नहीं मिलने से कई राज्य नाराज

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अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार

अजय कुमार,लखनऊ: देश की सर्वोच्च अदालत का कोरोना महामारी के चलते होने वाली मौतों और इससे निपटने के तिए केन्द्र या राज्य सरकारों की लापरवाही के खिलाफ गुस्सा जायज है। सुप्रीम कोर्ट लगातार सरकारों को आइना दिखाने साथ फटकार भी लगा रहा है। खासकर केन्द्र की मोदी सरकार के प्रति सुप्रीम कोर्ट की पीठ का रवैया ज्यादा ही सख्त है। ऐसा होना स्वभाविक भी है क्योंकि किसी राज्य में आक्सीजन या दवाओं की कमी होती है तो इसको पूरा करने की जिम्मेदारी केन्द्र के ही कंधों पर होती है। कोर्ट इस बात का भी ध्यान रखे हुए है कि उसके आदेशों को बिना हीलाहवाली के केन्द्र अक्षरता पालन करे। कोरोना महामारी से जनता को हो रही समस्याओं का निराकरण करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई बार स्वतःसंज्ञान लेकर भी संबंधित पक्षों को आदेश दे रहा है। हालात तब भी नहीं सुधरे तो सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को वैज्ञानिक फार्मूले और जरूरत के आधार पर पर्याप्त आक्सीजन आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए शीर्ष मेडिकल विशेषज्ञों की 12 सदस्यीय नेशनल टास्क फोर्स गठन कर दिया, यह फोर्स सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी। यह टास्क फोर्स आक्सीजन सप्लाई के आडिट के लिए उपसमूह बनाएगी और केंद्र सरकार को अपने सुझाव देगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक टास्क फोर्स अपने सुझाव देती है, केंद्र सरकार दिल्ली को रोजाना 700 टन आक्सीजन की आपूर्ति जारी रखेगी। 12 सदस्यीय नेशनल टाक्स फोर्स बनाने का आदेश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिया हैं।

यहां तक तो सब ठीक है,लेकिन यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो नेशलन टाक्स फोर्स गठित की है उसमें उन राज्यों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं रखा गया जो कोरोना महामारी से बुरी तरह से पीड़ित है। 12 सदस्यीय टीम में दिल्ली के अस्पतालों से तीन डाक्टरों, महाराष्ट और तमिलनाडु से दो-दो, गुरूग्राम और पश्चिम बंगाल से एक-एक के अलावा केन्द्र सरकार के सचिव स्वास्थ्य और परिवार कल्याण एवं केन्द्रीय कैबिनेट सचिव को भी शामिल किया है। कैबिनेट सचिव फोर्स के संयोजक होंगे और वह एक अतिक्ति सचिव स्तर के अधिकारी को अपने साथ जोड़ सकते हैं।यह टास्क फोर्स आक्सीजन सप्लाई के आडिट के लिए उपसमूह बनाएगी और केंद्र सरकार को अपने सुझाव देगी। इसी टीम में उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्य प्रदेश जेसे बड़े राज्यों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होना आश्चर्यजनक लगता है,जबकि यह राज्य सबसे अधिक जनसंख्या वाले हैं। यहां हालात भी कम खतरनाक नहीं हैं।

अंदाजा लगाइए ऐसी ही टीम यदि मोदी सरकार ने बनाई होती जिसमें गैर भाजपा राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं होता तो हाहाकार मच चुका होता। विपक्ष मोदी हाय-हाय करने लगता। मामला अदालत पहुंचता तो वहां से भी केन्द्र सरकार से सवाल-जबाव शुरू हो जाता। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कई बार यह देखने को मिला भी है। सुप्रीम कोर्ट की कोरोना महामारी से निपटने के लिए जो भी आदेश दे रहा है,वह ठीक है,लेेकिन सुप्रीम कोर्ट को यह नही भूलना चाहिए कि उसके कंधों पर पूरे देश की जिम्मेदारी है। इस समय सुप्रीम कोर्ट का पूरा ध्यान दिल्ली पर लगा हुआ है। इससे कोई एतराज नहीं है,लेकिन देश में अन्य जगह क्या हो रहा है,उसे भी तो उसे संज्ञान में लेना चाहिए।आक्सीतजन की कमी दिल्ली में ही हो ऐसा नहीं है। बस फकै इतना है कि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में बैठी है,इसलिए उसे वहां की समस्याएं आक्सीजन की किल्लत ज्यादा बड़ी लग रही हैं।जब दिल्ली की केजरीवाल सरकार यह कह रही है कि उसे आक्सीजन के मामले में केन्द्र से पूरा सहयोग मिल रहा है तब सुप्रीम कोर्ट केन्द्र को लगातार क्यों कटघरे में रखे हुए है। आम आदमी पार्टी के विधायक के यहां से आक्सीजन सिलेेडर का जखीरा बरामद होना यह साबित करता है कि आक्सीजन की किल्लत से अधिक उसके वितरण को सुनिश्चित करना और कालाबाजारी रोकना ज्यादा जरूरी है।

सवाल यह भी उठ रहा है कि बंगाल की हिंसा पर उसकी तरफ से पश्चिम बंगाल की सरकार को क्यों कोई दिशानिर्देश नहीं दिया जा रहा है,जहां भाजपा कार्यकर्ताओं का नंरसंहार हो रहा है। इसी प्रकार किसान आंदोलन के नाम पर सियासत करने वालों के बारे सख्त फैसला लेने से वह क्यों कतराता है। कोरोना काल में जिस तरह से कुछ किसान संगठन आंदोलन की सियासत करते हुए सड़क जाम करके बैठ गए हैं,उसका भी तो प्रभाव कोरोना महामारी से निपटने पर पड़ रहा है। यह सब सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिखता है। ऐसे ही एनआरसी के समय आंदोलन कारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला लेने से बचती रही थी। जिस कारण दिल्ली मे शाहीनबाग सहित देश के तमाम राज्यों में आंदोलनकारियों ने सड़कें जाम कर दी थीं। सुप्रीम कोर्ट को क्यों नहीं दिखता है कि आक्सीजन की समस्या दिल्ली के अलावा भी अन्य राज्यों को है,परंतु सुप्रीम कोर्ट का पूरा ध्यान दिल्ली पर ही टिका हुआ है,जबकि दिल्ली की समस्याओं पर विचार करने के लिए हाईकोर्ट मौजूद है और वह दिल्ली में आक्सीजन की किल्लत पर लगातार सुनवाई भी कर रहा है।सुप्रीम कोर्ट उन नेताओं का संज्ञान क्यों नहीं लेती है जो जमानत पर छूटने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशवासियों को विद्रोह के लिए उकसा रहे हैं। क्यों ऐसे लोगों की जमानत खारिज नहीं होती है।सुप्रीम कोर्ट उन बुद्धिजीवियों पर क्यों लगाम नहीं लगाती है जो मोदी विरोध में देश को बदमान करते हैं। बेबुनियाद आरोप लगाते हैं कि देश का मुसलमान डरा हुआ है। यह मुल्क मुसलमानों के रहने लायक नहीं रह गया है।पूर्व उपराष्टपति अंसारी दस वषो तक पद पर रहने के बाद कहते हैं कि मुसलमान डरा हुआ है तो उनसे क्यों नहीं इसके तथ्य मांगे जाते हैं। सुर्प्रीम कोर्ट क्यों नहीं कहती है कि देश के टुकड़े होता देखने का सपना पालने वालों के मुकदमों की सुनवाई जल्द से जल्द की जाए।

सुप्रीम कोर्ट को फैसला देते समय सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए। वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लोग एतराज जता रहे हैं।आम जनता तो दूर कई बड़े नेता और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग तक समय-समय पर उंगली उठा चुके हैं। वर्ष 2018 में एक समाचार एंजेंसी से बात करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत न्यायाधीश, जस्टिस जे.एस. वर्मा के 1990 के दशक में दिए गए प्रसिद्ध मगर विवादास्पद फैसले ‘हिंदुत्व जीने का तरीका’ को दोषयुक्त बताया है। पूर्व प्रधानमंत्री ने इस पुराने फैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि एक संस्थान के रूप में न्यायपालिका को, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना की हिफाजत करने के प्राथमिक कर्तव्य की अपनी दृष्टि नहीं खोनी चाहिए। मनमोहन ने कहा था कि यह काम पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है, क्योंकि राजनीतिक विवादों और चुनावी लड़ाइयों को धार्मिक रंगों, प्रतीकों, मिथों और पूर्वाग्रहों के साथ व्यापक रूप से घालमेल किया जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए न्यायमूर्ति वर्मा के फैसले की आलोचना की कि इसने एक तरह से एक प्रकार की संवैधानिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाया, जो देश की राजनीतिक बातचीत में बोम्मई फैसले के जरिए बहाल हुई थी, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि धर्मनिरपेक्षता, संविधान का एक बुनियादी ढांचा है।

सुप्रीम कोर्ट के अन्य विवादित फैसलों की बात कि जाए तो सवाल यही उठता है कि क्या हमारे देश की न्यायपालिकाएं देश में जो कुछ घट रहा है उसे सही ठंग से देख और समझ नहीं पाती हैं या फिर अन्य संस्थाओं की तरह न्यायपालिकाएं का भी स्तर गिर रहा है। अदालत से कई ऐसे फैसले आ जाते हैं जिनको देखकर तो यही लगता है कि न्यायपलिका मे सब कुछ ठीकठाक नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीशों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसको यह समझना चाहिए कि भारत जैसे बड़ी आबादी वाले एवं विविधता से भरे देश में यदि सबको निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा तो फिर न्यायालीय व्यवस्था पर सवाल तो उठेंगे ही और उसे आलोचना का शिकार भी होना पड़ेगा। लोगों की आवाज को अवमानना के नाम पर नहीं रोका जा सकता। अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी असामाजिक तत्व भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला, इंशा अल्ला, हम ले कर रहेंगे आजादी, कश्मीर में तिरंगा उठानेवाला कोई नहीं होगा, कहने वाले लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। तब देश आक्रोशित होता है और न्यायिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है। राम मंदिर, जलिकट्टु, सबरीमला, दीवाली पर पटाखे चलाने, रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठ, कश्मीरी पंडित, दही हांडी, महाकाल मंदिर, राफेल, लाऊड स्पीकर, गोहत्या व गोवंश हत्या बंदी आदि अनेक विवादित मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले सवालों के घेरे में रहे हैं।

कौन भूल सकता है उस दौर को जब मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर घाटी से हिंदुओं को प्रताड़ित कर खदेड़ दिया गया था। तब भारतीय सेना, पुलिस, प्रशासन एवं न्यायालय आदि सारी व्यवस्थाएं धरी की धरी रह गईं थीं। अपने ही देश में कश्मीरी हिन्दू विस्थापित हो गए। बलात्कार, हत्या, मारकाट, लूटपाट, कत्लेआम आदि प्रताड़नाओं को झेलने वाले कश्मीरी हिंदुओं ने जब थोड़ा संभलने के बाद न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की याचिका दायर की तो सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुनवाई करने तक से साफ इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पुराना हो गया है, सबूत जुटाने में मुश्किल होगी। जबकि यही सुप्रीम कोर्ट विदेशी रोहिंग्या मुसलमानों की दया याचिका स्वीकार कर लेता है और उस पर सुनवाई भी करता हैं लेकिन अपने ही देश के लोगों की सुनवाई नहीं करता। वहीं दूसरी ओर एक आतंकवादी की फांसी की सजा रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट आधी रात को भी चलता है लेकिन दशकों से आम जनता के ‘पेंडिंग केस’ की सुनवाई नहीं होती, उन्हें बस तारीख पर तारीख ही मिलती है।

हिन्दुओं के तीज त्योहारों से तो सुप्रीम कोर्ट कुछ खास ही नाराज रहता है। इसी लिए तो दीपावली का त्योहार आते ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ जाता है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वह भी केवल दीपावली के पर्व के दौरान ही। क्रिसमस व न्यू ईयर के दौरान पटाखों पर कोई रोक नहीं होती। शब-ए-बारात तक पटाखों से न तो शोर होता है और न ही उससे प्रदूषण फैलता है। सुप्रीम कोर्ट आदेश को लागू करने के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए कहता है कि उत्तर भारत में रात को और दक्षिण भारत में दिन में केवल 2 घण्टे ही आतिशबाजी कर सकते हैं। दिल्ली में केवल ग्रीन पटाखों का ही इस्तेमाल हो सकेगा। क्या सुप्रीम कोर्ट का उक्त आदेश तर्कसंगत एव न्यायसंगत था? क्या उसे अमल में लाया जा सकता था? यदि अमल में नहीं लाया जा सकता तो कोर्ट ऐसे आदेश ही क्यों देता है जिससे उसकी अवमानना हो। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर तमाम सांसदों ने सवालिया निशान लगाया था जो कि संवैधानिक व्यवस्था के लिए घातक है।

सुप्रीम कोर्ट सदियों पुरानी परंपराओं को भी अनदेखा करके आदेश दे देता है। इसी लिए तमिलनाडू में खेले जाने वाले जलिकुट्टु पर प्रतिबंध लगाने से पूरे तमिलनाडु में आक्रोश फूट पड़ा और इसके खिलाफ फिल्म स्टार से लेकर राजनेताओं सहित जनता ने मोर्चा खोल दिया। चेन्नई के मरीना बीच पर लाखों की संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ा। सभी ने एक स्वर में जलिकुट्टु के समर्थन और प्रतिबंध के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की। जनता के आक्रोश व चैतरफा दबाव के चलते राज्य सरकार ने एक संवैधानिक अध्यादेश पास कर राज्य में फिर से खेल शुरू करने का मार्ग प्रशस्त किया। ज्ञात हो कि पशुओं के अधिकारों और उन्हें क्रूरता से बचाने के लिए काम करनेवाली अनेक संस्थाओं ने मिलकर याचिका दायर की थी। उनकी मांग के अनुरूप कोर्ट ने जलिकुट्टु पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन जनता ने सड़कों पर भारी विरोध प्रदर्शन कर कोर्ट के फैसलों को पलटने पर मजबूर कर दिया। इस पर जनता का कहना था कि इस खेल में पशुओं के साथ क्रूरता नहीं की जाती और न ही पशुओं की जान जाती है। जबकि बकरी ईद पर भेड़-बकरी आदि पशुओं की बड़ी ही निर्दयता व क्रूरता से कुर्बानी (हत्या) दी जाती है। क्या एक ही दिन में लाखों-करोड़ो की संख्या में पशुओं की हत्याएं न्यायालय और पशुओं के अधिकारों के लिए काम करनेवाली संस्थाओं को दिखाई नहीं देती? लोगों की मांग है कि न्यायालय को इन सभी पहलुओं पर ध्यान देकर ही निष्पक्ष निर्णय देना चाहिए।

सबरीमाला विवाद भी नहीं भुलाया जा सकता है। वामपंथी नास्तिक, क्रिस्चियन एवं मुस्लिम महिलाओं ने मिलकर एक षड्यंत्र के तहत सबरीमाला मंदिर की पवित्रता, परंपरा, मान्यता व आस्था को चोट पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि सबरीमाला मंदिर में सभी वर्ग की महिलाओं को प्रवेश और पूजा-पाठ की इजाजत दी जाए। जबकि इन महिलाओं का आस्था, परंपरा और हिन्दू धर्म की मान्यताओं से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें तो केवल मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा और आस्था को खंडित करना था। वास्तविकता से कोसों दूर या फिर जानबूझकर करोड़ों हिंदुओं की जनभावना को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा फैसला सुना दिया। मंदिर प्रशासन ने कई बार अपनी बात रखने की कोशिश की किंतु दलीलों को अनसुना कर दिया। जिसके विरोध में केरल की जनता और अधिकतर श्रद्धावान महिलाओं ने भी सड़क पर उतरकर अनेकों बार आंदोलन किया। मंदिर की परंपरा व पवित्रता भंग न हो, इसके लिए हजारों-लाखों लोगों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए मंदिर परिसर व उसके आसपास के क्षेत्र को युद्ध का मैदान बना दिया। सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर दिशा निर्देश देकर अपने आदेश की पूर्ति करा रहा था। इस पर सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और प्रशासन केवल हिंदुओं के धार्मिक मामलों में ही हस्तक्षेप करने का साहस कर पाते हैं, क्योंकि हिन्दू समाज सहनशील है। वहीं दूसरी ओर सबरीमाला की तर्ज पर मुस्लिम महिलाओं को सभी मस्जिदों में प्रवेश व नमाज अदा करने की बात आएगी तो यहीं सुप्रीम कोर्ट बगलें झांकने लगेगा। न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी कि मुस्लिम महिलाओं को भी पूजा अर्चना करने के लिए मस्जिदों में प्रवेश दिया जाए तब न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था।

इसी तरह से एक बार सुप्रीम कोर्ट ने दही हांडी की ऊंचाई 20 फुट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए का आदेश पारित कर दिया। इसके साथ ही नाबालिग बच्चों (बाल गोविंदाओं) के मटकी फोड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। बाल गोविंदा किसी दुर्घटना का शिकार न हो इसके लिए यह रोक लगाई गई थी। इस पर भी खूब बवाल मचा था। इस फैसले की आलोचना करते हुए प्रतिक्रियाएं आई थीं कि ताजिया के जुलूस के दौरान पूरे देश भर में छोटे-छोटे बच्चों का खूनी मातम सुप्रीम कोर्ट को दिखाई नहीं देता, जो सरेआम बीच सड़क पर खून से लथपथ दिखाई देते हैं। इसके अलावा बीते कई दशकों से लंबित अयोध्या राम मंदिर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के लिए भी गले की हड्डी बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की तारीख पर तारीख वाली लेटलतीफी कार्रवाई से लोग ऊब गए हैं और न्यायालयीन प्रक्रिया पर तंज कस रहे हैं। लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो महीने भर के अंदर केस सुलझा लेती है और न चाहे तो 70 वर्षों में भी केस नहीं सुलझता। उदाहरण के रूप में चीफ जस्टिस पर लगे यौन शोषण का मामला और राष्ट्रीय महत्व का मामला राम मंदिर। इस पर भी सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई पर सभी नजर गढ़ाए हुए हैं।

अदालते जब दूसरों को आईना दिखाती हैं तो उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अक्सर इस बात की भी चर्चा होती रहती है कि, बेंच फिक्सिंग, अविश्वास का वातावरण, कोलेजियम विवाद, फोरम शॉपिंग के आरोपों, धौंस दिखाने की कोशिशों, मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिशों, बिचैलियों का दखल, आदि भ्रष्टाचारी गतिविधियों में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट सहित पूरी न्यायालय व्यवस्था आकंठ डूबी हुई है। अदालतों में दलालों का प्रभाव सबसे ज्यादा है और दखल बना रहता है। इन्हीं प्रमुख कारणों के चलते सरकार और सुप्रीम कोर्ट में टकराव की स्थिति भी देखने में आ रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इन सारी समस्याओं से निपट पाएगा और निष्पक्ष भेदभाव रहित न्याय समान रूप से जनता को मिलेगा?

ताज्जुब तो तब भी होता है जब एक बेगुनाह को वर्षो तक जमानत नहीं मिलती है वहीं बड़े लेकिन पूंजीपति अपराधियों को जमानत देने में अदालते इतनी तेजी से सुनवाई करती हैं मानों उनके पास और कोई काम ही नहीं रह गया हो। बड़े से बड़ा अपराधी भी कुछ दिनों या महीनों में जमानत हासिल कर लेता है।