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सोलह श्रृंगार…

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आज सबको बतलाता हूँ ,
नारी के सोलह श्रृंगार ।
कोमल शरीर को सँवार के ,
सज जाती है देखो नार ।।
परिवार की समृद्धि बढ़े ,
इसलिए नारी बिंदी लगाती ।
जीवन भर पति साथ निभाये ,
इसलिये माथे पे सिंदूर सजाती ।।
काजल आँखों में लगाकर ,
बुरी नजर से सबको बचाती ।
प्यार के गहरे रंग के खातिर ,
कोमल हाथो में मेहंदी रचाती ।।
पहनती है जो लाल जोड़ा ,
शादी में शुभ माना जाता ।
गजरा लगाती जब बालो में ,
श्रृंगार और भी बढ़ जाता ।।
मांग टीका लगाने से नारी ,
जीवन में सही निर्णय ले पाती ।
सुंदर नथ जब पहने नाक में ,
पति की बीमारी दूर भगाती ।।
कानों में पहनें कर्णफूल ,
बुराई सुनने-करने से बचाते ।
गले के वो नवलखे हार ,
नारी को बीमार होने से बचाते ।।
घर में धनधान्य हो इसलिए ,
हाथों में बाजूबंद पहनती ।
सुहाग का प्रतीक होती है ,
हाथों में चूड़िया खनकती ।।
अंगूठी अनमोल है क्योंकि ,
विश्वास प्यार की है निशानी ।
कमर में पहनती कमरबन्द ,
नारी ही है घर की स्वामिनी  ।।
हिम्मत कभी नहीं हारे नारी ,
अतः बिछुआ धारण करती ।
उसके आने की आहट हो जाती  ,
जब पायल झनकार करती ।।
शोभा बढे नारी की “जसवंत” ,
जब करती है सोलह श्रृंगार ।
मान और भी  बढ़ जाता है ,
क्योंकि ये है भारतीय संस्कार ।।
कवि जसवंत लाल खटीक
रतना का गुड़ा ,देवगढ़
काव्य गोष्ठी मंच, राजसमन्द