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इतिहास के पन्नो से…जब जबलपुर के टाउन हॉल पर झंडा फहरते ही लंदन तक मच गया था हड़कंप

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15  अगस्त को पूरे देश में तिरंगा फहराया जाएगा, लेकिन बहुत कम ही लोग जानते हैं कि यह तिरंगा हमें कैसे मिला? झंडा आंदोलन की शुरुवात कहां से और कब हुई? यहां हम देश में हुए झंडा सत्याग्रह के बारे में बता रहे हैं। देश में झंडा सत्याग्रह (झंडा आंदोलन) की चिंगारी जबलपुर से फैली थी। इसके बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।

देशव्यापी आंदोलन का नेतृत्व सरदार वल्लभाई पटैल ने किया था। इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने आंदोलनकारियों को जेल में बंद करना शुरु कर दिया। चार माह तक चले आंदोलन में करीब 17 सौ आंदोलनकारियों को जेल में बंद किया गया। अंत में आंदोलन का समापन नागपुर में हुआ। यह आंदोलन इसलिए खास था क्योंकि इस अंादोलन में ब्रिटिश झंडे की बजाय आंदोलनकारियों ने देश का झंडा फहराया था।

जबलपुर शहर के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में जान फूंकने का काम किया था गोलबाजार में हुए गांधी जी के भाषण ने। इसके बाद शहर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने देश में घटने वाली प्रत्येक घटना के साथ शहर में भी आंदोलन किए। वहीं कुछ आंदोलन ऐसे भी हुए हैं जिनकी शुरुआत ही शहर से हुई। झंडा सत्याग्रह एक ऐसा ही आंदोलन है। इतिहासविद डॉ. आनंद सिंह राणा ने बताया कि 1922 में कांग्रेस ने एक समिति गठित की। जिसका उद्देश्य अब तक चलाए गए असहयोग आंदोलन की सफलता का आंकलन करके अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था। सदस्यों में माेतीलाल नेहरू, विटृठलभाई पटेल, डॉ. अंसारी, चक्रवती राजगाेपालाचारी और कस्तूरी रंगा आयंगर प्रमुख थे। यह समिति अक्टूबर 1922 में जबलपुर आइ और गाेविंद भवन में ठहरी। जनता ओर से इन नेताओं को विक्टोरिया टाउन हॉल में आयाेजित एक समारोह में अभनिंदन पत्र भेेंट किया था। इस अवसर पर टाउन हॉल पर झंडा भी फहराया गया था।

टाउन हॉल पर झंडा फहराए जाने की खबर जब समाचार पत्रों में छपी तो लंदन की पार्लियामेंट में तहलका मच गया। भारतीय ममालों के सचिव लार्ड विंटरटन को इस बात की सफाई देने में बड़ा समय लगा। उन्होंने करतल ध्वनि के बीच पार्लियामेंट को आश्वस्त किया कि अब कभी भी शासकीय या अर्धशाासकीय इमारत पर तिरंगा नहीं फहराया गया। मार्च 1923 के तृतीय सप्ताह में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की दूसरी समिति आई। जिसमें बाबू राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जमनालाल बजाज और देवदास गांधी मुख्य थे। वे सब कांग्रेस की ओर से किए जा रहे रचानात्मक कार्यों का ब्योरा एकत्रित करने के उद्देश्य से पधारे थे। इस बार भी म्युनसिपिल कमेटी ने उन्हें मानपत्र देकर अभिनंदित करने का विचार किया। कंछेदीलाल जैन म्युनसिपैलटी के अध्यक्ष थे। इस नाते उन्होंने डिप्टी कमिश्नर हैमिल्टन को पत् लिखकर टाउन हॉल पर झंडा फहराने की अनुमति चाही। डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि यूनियन जैक के साथ तिरंगा फहराया जाए। इसके लिए कंछेदीलाल जैन तैयार नहीं हुए। जिससे अंसतोष उत्पन्न हुआ और जनता ने आंदोलन शुरू कर दिया।

वर्ष 1923 में पंडित सुंदरलाल नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उन्हांने जनता को आंदोलित किया कि टाउन हॉल पर झंडा अवश्य फहराया जाए। वे 18 मार्च को अपने साथ प्रमुख स्थानीय नेताओं बालमुकुंद ित्रपाठी, बद्रीनाथ दुबे,सुभद्रा कुमारी चौहान, ताजुद्दीन अब्दुल रहीम,माखनलाल चतुर्वेदी के साथ टाउन हॉल पहुंचे। यहां एक प्रेमचंद नाम के नौजवान ने सीताराम यादव, परमानंद जैन, खुशालचंद्र जैन की सहायता से टाउन हाॅल के शिखर पर झंडा फहरा दिया। इसके बाद तुरंत कार्रवाई की गई। अंग्रेजों की कार्रवाई ने आंदोलन और तेज हो गया। जबलपुर के बाद नागपुर में भी झंडा सत्याग्रह आरंभ किया गया। इस तरह जबपुर से शुरू हुआ झंडा सत्याग्रह पूरे देश में फैल गया।