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Chitragupta Puja 2021 : ब्रह्मा से कैसे हुई चित्रगुप्त की उत्पत्ति, जानिए कथा

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Chitragupta Puja 2021 : चित्रगुप्त के वशंज छह नवम्बर को कलम (लेखनी) की पूजा करेंगे। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि में भगवान चित्रगुप्त की पूजा की जाती है। इस दिन कलम और दवात की भी पूजा की जाती है। आज ही बहीखातों की भी पूजा की जाती है, बिना कलम की पूजा किए हुए चित्रगुप्त वशंज पानी नहीं पीते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रलय के अनन्तर परमपिता ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ किया, और मनुष्य सहित अन्य जीव जन्तुओं को उदय हुआ। कर्मफल की व्यवस्था संभाली धर्मराज ने, शुभकर्मों के फलस्वरूप पुण्य और अशुभ कर्मों के परिणाम में पाप का भागी होने की व्यवस्था दी गई। धर्मराज यह लेखा-जोखा रखने में पूर्ण सक्षम थे। अतः सृष्टि व्यवस्था सुचारु चलती रही। धीरे -धीरे जनसंख्या बढ़ती, वंशावलियों का वस्तिार हुआ, मानव शरीरों की संख्या गणना कठिन प्रतीत हुई, पाप-पुण्य का लेखा- जोखा रखना दुश्कर हुआ। धर्मराज आकुल-व्याकुल होकर पहुंचे परमपिता ब्रह्मा के चरणों में और कहा ”मुझे सहायक चाहिए, कार्याध्यक्ष चाहिए। पितामह ध्यानमगन हुए, तप प्रारम्भ हुआ, एक हजार वर्ष बीत गए, शरीर में स्पन्दन हुआ, शुद्ध चैतन्य ब्रह्म शरीर डोलायमान हुआ और प्रगट हुआ ब्रह्म शरीर से तेजोदीप्त, दव्यि, स्थूल रूप, वर्ण तीसी के फूल के समान श्यामल, कण्ठ शंख के समान सुडौल, कण्ठ रेखा कबूतर के गले की रेखा के समान चिकनी, नेत्र कमल की पंखुरी के समान आकर्षक, हाथ आजानु दीर्घ, शरीर-सौष्ठव पूर्ण पीताम्बर-धारी, विद्युत सम आभावान्, दाहिने हाथ में लेखनी, बांए हाथ में दवात वे नवीन पुरुषाकृति पितामह के चरणों में नतमस्तक हुए। पितामह ने अपने प्रतिरूप सदृश पुरुष के हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। पुरुष ने पितामह से विनम्र भाव से कहा ”पिता! कृपया मेरा नाम, वर्ण, जाति और जीविका का निर्धारण कीजिए। पितामह ने उत्तर दिया ह्ल तुम मेरे चित्त में गुप्त रूप से वास करते थे अतः तुम्हारा नाम चित्रगुप्त हुआ। तुम मेरी काया में स्थित थे अथवा जो चैतन्य समभाव से सबकी काया से साक्षी है वही तुम में भी अन्तः है अतः वर्ण कायस्थ हुआ। तुम धर्म-अधर्म के विचार का लेखा -जोखा रख कर मानव जाति के अस्तत्वि की रक्षा करोगे अतः जाति क्षत्रिय हुई। तुम विद्याध्ययन के माध्यम से ख्याति को प्राप्त होगे अतः जीविका पठन और लेखन हुई तुम्हारा वास स्थान पृथ्वी लोक में अवन्तिपुरी हुआ।”

श्री भगवान चित्रगुप्त पितामह का आदेश पाकर धरती पर आए ‘अवन्तिपुरी में श्री महादेव के मन्दिर को अपना स्थायी आवास बनाकर वहां अध्ययन कर्म से दत्तचित्त हुए। उनकी श्रद्धा भक्ति से महादेव शंकर प्रसन्न हुए। देवाधिदेव शंकर एक बार किसी कार्यवश सूर्यलोक गए सुशमी ऋषि की पुत्री शुभावती उस समय सूर्यलोक में रहती थी। अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी शुभावती का परिचय पूछने पर सूर्यदेव ने बताया ”सुशमी ऋषि ने एक पुत्रेष्टि यज्ञ किया परन्तु यज्ञफल रूप में पुत्री प्राप्त हुई। यज्ञ को अपूर्ण मानने पर पुत्री को पालनार्थ मेरे पास छोड़ पुनः यज्ञ करने के निमत्ति अवन्ति पुरी चले गए हैं। उन्हीं क्षणों में आकाशवाणी हुई यह कन्या सौभाग्य शालिनी है। इसका विवाह अजर अमर पुरुष से होगा। महादेव आकाशवाणी सुन हर्षित स्वर में बोले-”सूर्यदेव! पुत्री शुभावती को अवन्तिपुरी ले चलो, वहां इनके पिता की अनुमति से इनका विवाह चिरयुवा श्री चित्रगुप्त से सम्पन्न हो।” सूर्य भगवान सपरिवार अवन्तिपुरी आए, चित्रगुप्त और शुभावती परिणय सूत्रमें बंधे। श्री चित्रगुप्त की विद्वता और विनम्रता से प्रभावित होकर सूर्य के बन्धुज श्राद्ध देव मनु ने भी अपनी नन्दिनी नाम की सुशीला कन्या का विवाह श्री चित्रगुप्त के साथ किया। 

परमपिता ब्रह्मा अपने मानसपुत्र के विवाह में सम्मिलित हुए और आशीर्वाद से तृप्त किया ”चिरंजीवी हो, ज्ञानी हो, देवताओं में प्रतष्ठिति हो, परोपकार के लिए समर्पित हो। तुम्हारी पूजा करने वाला उत्तम गति का अधिकारी हो। तुम्हारा वंश सृष्टि से प्रल तक निर्बाण बढ़े। तुम्हारा वंश तुम्हारे समान शक्षिा में रूचि रखने वाला, परोपकारी और पररक्षक हो। तुम अपने वंश सहित छात्र धर्म का पालन करो। धम्रराज की सभा तुम्हारा कार्यस्थल बने। तुम न्यायपूर्वक सभी प्राणियों के धर्म-अधर्म का विचार करो। श्री चित्रगुप्त ने आशीर्वाद सहज स्वीकार किया।” श्री चित्रगुप्त अपनी दोनों पत्नियों शुभावती व नन्दिनी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। शुभावती से उन्हें आठ पुत्र प्राप्त हुए चारु, सुचारु, चित्रचारु, मतिमान, हेमबाण, चित्र, अरूण तथा जितेन्द्रिय। द्वितीय पत्नी नन्दिनी से चार पुत्ररत्न मिले- भानु, स्वभानु, विश्वभानु और बृजभानु। सभी 12 शिशुओं की किलकारियों से आंगन गूंज उठा। माता-पिता धन्य हुए। शैशव से किशोरावस्था में बालकों का प्रवेश हुआ। पितामह, ब्रह्मा, देवगुरू वृहस्पति तथा असुरगुरू शुक्राचार्य के संरक्षण में उपनयन संस्कार के अनन्तर अध्यापन आरम्भ हुआ। सभी सहोदर सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत हुए। माता-पिता को विवाह की चिंता हुई। पिता श्री चित्रगुप्त तीनों लोकों में सुयोग्य कन्याएं खोजते हुए नागपुरी पहुंचे। नागराज की श्रेष्ठतम कन्याओं को देख उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। नागराज की स्वीकृति प्राप्त कर उनकी पुत्रियों को अपने पुत्रों की वधू बनाया।

वैदिक विधि से पाणग्रिहण के अनन्तर जीवनसंगी बने भानु एवं पद्यिनी, स्वभानु एवं कामिनी, विश्वभानु एवं देवरूपिणी, बृजभानु एवं नर्मदा, चारु एवं भद्रकाली, सुचारु एवं भुजंगाक्षी, चित्रचारु, एवं सुखदेवी, मतिमान एवं गण्डकी, हेमबाण एवं कलशसोनी, चित्र एवं पंकजाक्षी, अरुण एवं कामकला, तथा जितेन्द्रिय, एवं मनभावनी। वे सभी वर-वधू माता-पिता की रद्धा पूर्वक सेवा करते हुए छः मन्वन्तर पर्यन्त स्वर्ग में रहें पुनः उन्हें आदेश हुआ अपनी सगुण, तेजस्विनी पत्नियों के साथ मृत्युलोक में जाकर मानव योनि के वस्तिार का राजा इक्ष्वाकु के राज्य में भानु मंत्री चारु लेखक व सुचारु गणक हुए। भानु ने मथुरा में अपना स्थायी भवन बनाया वे माथुर कहलाए। चारु मगध की राजधानी सूरध्वज के वासी हुए अतः सूरध्वज कहलाए। सुचारु ब्रह्मावर्त अथवा अस्बष्ठ प्रदेश के वासी हुए अतः अम्बष्ट कहे गए। इन तीनों भाइयों को शक्ति अथवा देवी की उपासना का अधिकार मिला। स्वभानु, चित्रचारू, मतिमान निःश्रेष्ठ राजा की सभा के क्रमशः मंत्री, लेखक व गणक हुए। स्वभानु व्ध्यियाचल अथवा भट्ट प्रदेश में रहने से भट्टनागर चित्रचारु अहिंसा या गौड़वासी होने से गौड़ तथा मतिमान सरयूपार निगम देश के वासी होने से निगम देश के प्रवर्तक हुए। इन तीनों भाइयों को जयन्ती महारानी की पूजा का अधिकार मिला। विश्वभानु हेमवान एवं चित्र भा्रतागण राजा नभग के राज्य में मंत्री, लेखक व गणक के पद को क्रमशः प्राप्त हुए। विश्वभानु सकाशपुरी में रहने से सक्सेना, हेमवान कर्णाटक प्रदेश में रहने से कर्ण तथा चित्र अहिस्थावान वासी होने से आष्ठाना कुल के प्रथम दीपक माने गए। इन्हें शाकम्भरी देवी के पूजन का अधिकार मिला। बृजभानु, अरूण तथा जितेन्द्रिय राजा के राज्यशासन में क्रमशः मंत्री, लेखक व गणक पदों पर नियुक्त हुए। बृजभानु श्री नगर में निवास करनेसे श्रीवास्तव अरूण कलापनगर में वास करने से कुल श्रेष्ठ और जितेन्द्रिय बाल्मीकि नगर में रहते हुए बाल्मीक संबोधनों से प्रसद्धि हुए। इन तीनों भ्राताओं को लक्ष्मी की अर्चना का सौभाग्य मिला। इसप्रकार वे सभी भ्राता बुद्धिजीवी होकर बुद्धिजीवी क्षत्रियों के मध्य प्रतष्ठिति हुए। सम्पूर्ण कथावाचन के उपरान्त निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि परमपिता ब्रह्मा एवं उनके ध्यानज पुत्र श्री चित्रगुप्त महाराज का जो पारस्परिक अधिदेवता तथा प्रत्यधिदेवता सम्बन्ध पुराणों में चर्चित है वह न तो आकस्मिक है, न काल्पनिक अपितु मौलिक है। बृद्ध ब्रह्मा प्रसिद्ध है तपस्या, यजन -याजन इत्यादि के लिए तो श्री चित्रगुप्त धर्माधिकारी, न्यायपालक, दण्डनीतज्ञि, लेखन -विशेषज्ञ विवेक सम्पन्न विभन्नि राजकीय कार्यालयों में कार्य व्यस्त राजकीय पुरुष के रूप में, अतः कार्यस्थ वंश के आदि पुरुष के रूप में स्थापित पितामह ब्रह्मा ने ब्राह्मी लिपि (लिपि विशेष) का आवष्किार किया तो श्री चित्रगुप्त भगवान ने उस के अक्षरों को आकार दिया। इतने बुद्धिमान और यशस्वी कि यमराज भी मनुष्यों के सत और असत कर्मों का निर्णय करने के लिए श्री चित्रगुप्त भगवान के बहीखातों पर पूर्ण निर्भर करते हैं, चित्रगुप्त वशंज अपने-अपने घर पर भी पूजा करते है तथा पूजन का आयोजन चित्रगुप्त मन्दिर मे भी किया जाता है।