Home Dharm दर्शन : अध्यात्म है भीतर की ओर देखना- श्री श्री रविशंकर

दर्शन : अध्यात्म है भीतर की ओर देखना- श्री श्री रविशंकर

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हमारी कर्मेंद्रियां हमें बाहरी जगत के दृश्य दिखाती हैं। वे हमें सांसारिकता का बोध तो कराती हैं, लेकिन आध्यात्मिकता का मार्ग नहीं दिखातीं। आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने के लिए हमें अपने भीतर की ओर देखना पड़ेगा। बाहर की चेतना जब अंदर की ओर मुड़ जाती है, तो आपको सत्य का बोध हो जाता है। सत्य का यह ज्ञान ही फिर ब्रह्म का बोध कराता है।

जगत देखना हो तो इंद्रियों से बाहर की ओर देखना होगा, जबकि आध्यात्मिकता का अर्थ भीतर देखना है। जब आप अपने भीतर देखते हैं, तो समझ पाते हैं कि जो बदलता नहीं है, वही सत्य है। मन उन इंद्रियों से कहीं श्रेष्ठ है, जो उसे सूचनाएं देती हैं; और प्राण या जीवन शक्ति हर पदार्थ में व्याप्त है।

मानव जाति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मनुष्य भीतर नहीं देखता, वह बाहर देखता रहता है। कोई भी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक यह परिभाषित करने में सक्षम नहीं है कि मन क्या है। लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि मन क्या है। वे इसे मन: कहते थे। मन शब्द का अर्थ है चेतना, बाहर जाती हुई चेतना का नाम मन है। जब बाहर की ओर जा रही चेतना भीतर मुड़ती है, तो उसे नम: कहा जाता है, अर्थात मन का न होना। इस तरह यह चेतना है, जो आंखों से बाहर जाती है और जगत को देखती है और यह स्वयं को प्रक्षेपित करती है। जो मन में है, चेतना उसे ही प्रक्षेपित करती है।

कभी-कभी लोग मुझसे पूछते हैं, ‘आप मुझसे इतने नाराज क्यों हैं? आपने मेरी तरफ नहीं देखा।’ यह लोगों का अपना प्रक्षेपण है। हमारे मन में जो कुछ है, हम उसे दूसरों पर प्रक्षेपित करते हैं, उदाहरण के लिए, ‘ओह! वह व्यक्ति मुझसे नाराज है।’ लेकिन वह नाराज नहीं भी हो सकता है। हो सकता है कि वह आपके बारे में कुछ सोच ही नहीं रहा हो। मन बाहर जा रहा है। वह चेतना ही मन है, जो आंखों से बाहर बहती है। आंखें नहीं देखती हैं, बल्कि आंखों के द्वारा कोई सब कुछ देखता है; कानों के द्वारा कोई सब कुछ सुनता है; नाक के माध्यम से कोई सब कुछ सूंघता है। वह मन है, जो अपने चारों ओर की हर चीज को मापता है।

इस सारी दुनिया को माया कहा जाता है। माया का अर्थ है- जिसे मापा जा सके। यहां सब कुछ मापा जा सकता है। आप कह सकते हैं कि इस प्रकाश की तीव्रता कितनी है या वह ध्वनि कितनी प्रबल है। सभी संवेदी धारणाओं को पांच इंद्रियों के माध्यम से मापा जा सकता है। मापन वास्तविकता नहीं है, क्योंकि यह समय-समय पर और जगह-जगह बदलता रहता है। सत्य वह है, जो समय और स्थान से अप्रभावित रहता है। यही सत्य की परिभाषा है। क्या हमारा शरीर सच है? नहीं, क्योंकि यह समय और स्थान से प्रभावित होता है। आप जो कुछ भी देखते हैं वह बदल जाता है- फूल आज यहां है, लेकिन कल नहीं होगा और कल नहीं था, इसलिए यह सच नहीं है। जो कुछ काल से अर्थात भूत, वर्तमान और भविष्य से प्रभावित न हो, वही सत्य है।

संसार सत्य नहीं है, क्योंकि संसार समय से प्रभावित है। हमारी धारणा समय और स्थान से प्रभावित होती है। इसलिए धारणा सच नहीं है। अपने आस-पास की दुनिया में आप जो कुछ भी देखते हैं, वह सत्य नहीं है। एक झटके में यह सब चला जाता है। आपकी धारणा के साधन दोषपूर्ण हैं। जब कोई आपसे सच बोलने के लिए कहे, तो आप बस मुस्कुरा दें। सच बताओ? सत्य असीमित है- यह समय तक सीमित नहीं है। कल की वास्तविकता आज झूठी है, और आज की वास्तविकता कल कभी मौजूद नहीं थी, और यह कल मौजूद नहीं हो सकती है। हालात बदलते हैं। यदि आप किसी को मूर्ख कहते हैं, तो यह सच नहीं है, क्योंकि कल वह बहुत बुद्धिमान हो सकता है। कल जिसे आपने बहुत सफल कहा, आप नहीं जानते कि वह कल क्या होगा। वह दुखी हो सकता है या जो दुखी था, वह अब अच्छा कर रहा है।

सब कुछ बदल जाता है, पर सच क्या है? यही यात्रा है: सत्य क्या है? वह क्या है, जिसे तुम सत्य कह सकते हो? यह चेतना क्या है, जो हर पदार्थ के पीछे है, इस सम्पूर्ण अस्तित्व के पीछे है? क्या स्वर्ग में कोई भगवान आप पर उंगली उठा रहा है और कलम के साथ बैठा है, आपने क्या गलतियां की हैं और आपको सजा देने की कोशिश कर रहा है? क्या भगवान कोई ऐसा है, जो आपकी सभी गलतियों पर बात-बात पर क्रोधित होने वाला है? ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। जो सत्य है, ज्ञान है, अनंत है, वही देवत्व है। यदि आप फैक्स मशीन में कागज डालते हैं और आप यहां एक बटन दबाते हैं, तो वह प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक रूप से ले जाया जाता है। उदाहरण के लिए, चीन में आप इसे प्राप्त कर सकते हैं, इतनी दूर! उस जानकारी का क्या हुआ, जिसे आपने यहां डाला और ब्रह्मांड में छोड़ा? हजारों मील दूर वही सूचना ठीक उसी तरह छपती है। यह कैसे हो सकता है? क्या आपने इस बारे में कभी सोचा? सेल फोन में यदि आप कुछ कहते हैं, तो वे शब्द उसमें चले जाते हैं और फिर वे अंतरिक्ष में चले जाते हैं और ठीक उसी तरह दूसरी जगह कहीं और पुन: उत्पन्न हो जाते हैं। तो, इन दो सेल फोनों के बीच यह जानकारी कहां/कैसे ले जाई जाती है? क्या आपने इस बारे में कभी सोचा? व्यावहारिक रूप से यहां कोई समय भी नहीं लगता, साथ ही यह जानकारी बरकरार रहती है। यह ज्ञान जिस माध्यम में बह रहा है, वह सूचनाओं से भरा हुआ है। वही ब्रह्म है।